हॉर्मुज जलडमरूमध्य में दक्षिण कोरियाई युद्धपोत भेजना कोई सैन्य रणनीति नहीं बल्कि एक लाचार कूटनीतिक ड्रामा है

हॉर्मुज जलडमरूमध्य में दक्षिण कोरियाई युद्धपोत भेजना कोई सैन्य रणनीति नहीं बल्कि एक लाचार कूटनीतिक ड्रामा है

मुख्यधारा का मीडिया चीख-चीखकर आपको बता रहा है कि दक्षिण कोरिया ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अपना 'खतरनाक' विध्वंसक युद्धपोत (Destroyer) भेजकर अमेरिका-इरान तनाव में एक नया मोर्चा खोल दिया है। रक्षा विशेषज्ञ टीवी स्टूडियो में बैठकर नक्शों पर उंगलियां घुमा रहे हैं। वे दावा कर रहे हैं कि 260 नौसैनिकों से लैस यह वांग गियोन (Wang Geon) युद्धपोत खाड़ी में ताकत का संतुलन बदल देगा।

यह सब बकवास है।

सच्चाई यह है कि दक्षिण कोरिया का यह कदम कोई आक्रामक सैन्य रणनीति नहीं है। यह सियोल की लाचारी, कूटनीतिक डरपोकपन और वाशिंगटन के सामने घुटने टेकने की एक बानगी भर है। जिसे दुनिया एक 'पावर मूव' समझ रही है, वह वास्तव में एक ऐसी नौसेना की छटपटाहट है जो अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए दूसरों की दया पर निर्भर है। मुख्यधारा की रिपोर्टिंग ने हमेशा की तरह इस पूरी घटना के मूल आर्थिक और रणनीतिक अंतर्विरोधों को नजरअंदाज कर दिया है।

खोखली ताकत का प्रदर्शन: एक युद्धपोत की असलियत

आइए सबसे पहले इस 'खतरनाक युद्धपोत' के मिथक को ध्वस्त करते हैं। 4,400 टन का यह चेओनगुआन- II क्लास डिस्ट्रॉयर एंटी-शिप मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस जरूर है, लेकिन इसे जिस इलाके में भेजा गया है, वहां इसकी सैन्य उपयोगिता शून्य के बराबर है।

इरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की नौसेना कोई पारंपरिक नौसेना नहीं है जो समुद्र के बीचों-बीच आमने-सामने की जंग लड़ेगी। उनकी रणनीति 'एसिमेट्रिक वॉरफेयर' (Asymmetric warfare) पर आधारित है। वे सैकड़ों की संख्या में तेज रफ्तार सुसाइड बोट्स, बारूदी सुरंगों (Naval mines) और तट पर छिपे एंटी-शिप क्रूज मिसाइल नेटवर्क्स का इस्तेमाल करते हैं। हॉर्मुज जलडमरूमध्य की चौड़ाई कुछ जगहों पर महज 21 मील है, जिसमें से जहाजों के आने-जाने का रास्ता (Shipping lanes) सिर्फ दो-दो मील चौड़ा है।

इस संकरे गलियारे में एक बड़ा डिस्ट्रॉयर एक बहुत ही आसान निशाना (Sitting duck) बन जाता है। इरान के पास मौजूद 'नूर' और 'कादर' जैसी मिसाइलों के सामने यह युद्धपोत अकेला कुछ नहीं कर सकता। मैंने दशकों तक वैश्विक सुरक्षा के खेल को करीब से देखा है; जब देश वास्तविक युद्ध के लिए जाते हैं, तो वे अकेले जहाजों को नहीं भेजते। वे एयरक्राफ्ट कैरियर बैटल ग्रुप्स भेजते हैं। दक्षिण कोरिया ने जो किया है, वह सिर्फ एक 'फ्लैग-वेविंग' एक्सरसाइज है—यानी सिर्फ अपनी मौजूदगी दर्ज कराना ताकि दुनिया को लगे कि वे कुछ कर रहे हैं।

सियोल की दोहरी चाल और वाशिंगटन का दबाव

पीपुल आल्सो आस्क (PAA) के तहत अक्सर लोग पूछते हैं: "क्या दक्षिण कोरिया अमेरिका के दबाव में ईरान के खिलाफ युद्ध में शामिल हो रहा है?"

इसका सीधा जवाब है: नहीं, लेकिन वह अपनी रीढ़ की हड्डी बचाने की कोशिश जरूर कर रहा है।

ट्रम्प प्रशासन के समय से ही वाशिंगटन ने सियोल पर खाड़ी में 'इंटरनेशनल मैरीटाइम सिक्योरिटी कंस्ट्रक्ट' (IMSC) यानी अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन में शामिल होने का भारी दबाव बनाया था। अमेरिका चाहता था कि दक्षिण कोरिया अपनी सुरक्षा की कीमत खुद चुकाए। दूसरी तरफ, दक्षिण कोरिया का 70% से अधिक कच्चा तेल इसी हॉर्मुज के रास्ते आता है। वह ईरान को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकता था, जो कभी उसका एक बड़ा व्यापारिक भागीदार था।

तो सियोल ने क्या किया? उन्होंने एक ऐसा कूटनीतिक खेल खेला जो उनकी कायरता को उजागर करता है। उन्होंने अपने इस युद्धपोत को अमेरिका के नेतृत्व वाले IMSC कमांडर के अधीन नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने सोमालिया के तट पर समुद्री लुटेरों से निपटने के लिए तैनात अपने 'चेओनहेUnit' (Cheonhae Unit) के परिचालन क्षेत्र का विस्तार कर दिया।

यह एक घटिया कूटनीतिक समझौता है। अमेरिका को खुश करने के लिए उन्होंने जहाज को खाड़ी की तरफ भेज दिया, और ईरान को शांत करने के लिए कह दिया कि "देखिए, हम अमेरिकी मिशन का हिस्सा नहीं हैं, हम तो बस अपने जहाजों की रक्षा स्वतंत्र रूप से कर रहे हैं।" जब आप दोनों पक्षों को खुश करने की कोशिश करते हैं, तो अंत में आप दोनों के निशाने पर आ जाते हैं। ईरान इस चाल को बखूबी समझता है।

तेल और कूटनीति का आत्मघाती घालमेल

इस पूरे घटनाक्रम के आर्थिक पहलू को समझिए, जिसे अक्सर रिपोर्टों में दबा दिया जाता है। दक्षिण कोरियाई बैंकों में ईरान के लगभग 7 अरब डॉलर के तेल भुगतान की राशि फंसी हुई थी, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण फ्रीज कर दी गई थी। ईरान इस बात से बौखलाया हुआ था।

जब दक्षिण कोरिया इस संकट को सुलझाने में नाकाम रहा, तो उसने कूटनीति के बजाय वहां सेना भेज दी। यह आग बुझाने के लिए पेट्रोल का इस्तेमाल करने जैसा है। इरान की तेल टैंकरों को बंधक बनाने की क्षमता जगजाहिर है। जनवरी 2021 में ईरान ने दक्षिण कोरिया के केमिकल टैंकर ' Hankuk Chemi' को इसी इलाके में जब्त कर लिया था। उस समय भी दक्षिण कोरिया का यह तथाकथित खतरनाक युद्धपोत कुछ नहीं कर पाया था। अंततः सियोल को कूटनीतिक टेबल पर आकर ही बात करनी पड़ी।

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई मध्यम क्रम की ताकत (Middle power) खाड़ी के इस दलदल में पैर फंसाती है, तो वह केवल महाशक्तियों के खेल में मोहरा बनकर रह जाती है। दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय के रणनीतिकार यह भूल रहे हैं कि खाड़ी में उनकी सैन्य उपस्थिति का मतलब उनके अपने वाणिज्यिक जहाजों (Merchant vessels) को ईरान के लिए एक वैध राजनीतिक निशाना बनाना है।

रणनीतिक अंधापन: उत्तर कोरिया का खतरा भूल गए?

सबसे हास्यास्पद बात यह है कि दक्षिण कोरिया अपनी सीमाओं पर बैठे वास्तविक और परमाणु-सशस्त्र खतरे को छोड़कर हजारों मील दूर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन करने की कोशिश कर रहा है। उत्तर कोरिया लगातार अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण कर रहा है, उसकी पनडुब्बियां कोरियाई प्रायद्वीप के आसपास मंडरा रही हैं।

ऐसी स्थिति में अपने एक प्रमुख नौसैनिक एसेट और ढाई सौ से अधिक प्रशिक्षित नौसैनिकों को एक ऐसे मिशन पर भेज देना जिसका कोई स्पष्ट सैन्य लक्ष्य नहीं है, रणनीतिक अंधापन है। दक्षिण कोरियाई नौसेना के पास इतनी बड़ी क्षमता नहीं है कि वह एक ही समय में अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा भी करे और मध्य पूर्व के समुद्री मार्गों की रखवाली भी करे। वे अपनी सीमित क्षमताओं को जरूरत से ज्यादा फैला रहे हैं (Overextending capabilities), जो किसी भी सैन्य बल के लिए आत्मघाती होता है।

इस दृष्टिकोण में एक बड़ा नुकसान यह है कि यदि इरान और दक्षिण कोरियाई सेना के बीच अनजाने में भी कोई झड़प हो जाती है, तो दक्षिण कोरिया के पास उस क्षेत्र में खुद को बचाने के लिए कोई रसद बैकअप (Logistical backup) या वायु सेना की सुरक्षा (Air cover) नहीं है। वे पूरी तरह से अमेरिकी नौसेना की दया पर निर्भर होंगे। तो फिर इस 'स्वतंत्र मिशन' का ढोंग क्यों?

मीडिया के प्रोपेगैंडा को खारिज कीजिए

सुरक्षा का विश्लेषण भावनाओं या जहाजों की बंदूकों के आकार से नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक वास्तविकताओं से होता है। मुख्यधारा के मीडिया ने इस खबर को इस तरह पेश किया जैसे दक्षिण कोरिया कोई वैश्विक महाशक्ति बन गया है जो मध्य पूर्व के संकटों को हल करने निकला है। यह एक भ्रामक विमर्श है।

दक्षिण कोरिया ने हॉर्मुज में युद्धपोत इसलिए नहीं भेजा क्योंकि वह शक्तिशाली है। उसने इसे इसलिए भेजा क्योंकि उसके पास तेल के वैकल्पिक मार्ग खोजने की कोई दीर्घकालिक योजना नहीं है, क्योंकि उसकी विदेश नीति वाशिंगटन के दबाव के आगे पंगु है, और क्योंकि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक रूप से दिवालिया हो चुका है।

जहाज भेजने से सुरक्षा नहीं आती, केवल भ्रम आता है। सियोल ने खाड़ी में जो दांव खेला है, वह उसकी ताकत का प्रतीक नहीं बल्कि उसकी रणनीतिक लाचारी का सबसे बड़ा सबूत है। अगली बार जब आप किसी अखबार में "खतरनाक युद्धपोत रवाना" की हेडलाइन देखें, तो समझ जाइएगा कि पर्दे के पीछे कोई कमजोर देश अपनी साख बचाने की नाकाम कोशिश कर रहा है।

DG

Daniel Green

Drawing on years of industry experience, Daniel Green provides thoughtful commentary and well-sourced reporting on the issues that shape our world.