डोनाल्ड ट्रंप फिर से वही कर रहे हैं जो वो सबसे बेहतर जानते हैं—दुनिया को चौंकाना। ईरान के साथ उनके पुराने झगड़े किसी से छिपे नहीं हैं। सबको लगा था कि अगर ट्रंप वापस आए तो तेहरान के लिए मुश्किलें बढ़ेंगी। लेकिन ट्रंप ने पासा पलट दिया है। उन्होंने साफ कर दिया है कि वो ईरान से समझौता करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। पर यहाँ एक बड़ा पेच है। वो ईरान से कोई लंबी-चौड़ी लिस्ट नहीं मांग रहे। उन्हें बस एक बात की गारंटी चाहिए।
वो गारंटी है परमाणु हथियार। ट्रंप का सीधा सा लॉजिक है कि ईरान के पास न्यूक्लियर बम नहीं होना चाहिए। बस इतना मान लो और बाकी सब पर बात हो सकती है। ये सुनने में जितना आसान लगता है, असल में इसकी गहराई उतनी ही पेचीदा है। ट्रंप कोई पारंपरिक राजनेता नहीं हैं जो कूटनीति की बारीकियों में उलझें। वो एक बिजनेसमैन की तरह डील करना चाहते हैं। उनके लिए ये एक ट्रांजेक्शन है।
ट्रंप की ईरान नीति का नया अवतार
पिछली बार जब ट्रंप राष्ट्रपति थे, तो उन्होंने ओबामा दौर की न्यूक्लियर डील (JCPOA) को कूड़ेदान में फेंक दिया था। उन्होंने ईरान पर 'मैक्सिमम प्रेशर' की नीति अपनाई। प्रतिबंध इतने कड़े कर दिए कि ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। अब लोग पूछ रहे हैं कि अचानक ये नरम रुख क्यों? असल में ये नरमी नहीं है। ये एक स्ट्रेटेजिक शिफ्ट है। ट्रंप जानते हैं कि ईरान को पूरी तरह मिटाना मुमकिन नहीं है। लेकिन उसे एक दायरे में बांधना मुमकिन है।
वो जानते हैं कि ईरान इस वक्त दबाव में है। वहां की जनता महंगाई और पाबंदियों से परेशान है। ट्रंप इसी कमजोरी का फायदा उठाना चाहते हैं। वो मैसेज दे रहे हैं कि अगर तुम अपनी जिद छोड़ दो, तो मैं तुम्हारे लिए दरवाजे खोल सकता हूँ। ईरान को बस ये वादा करना होगा कि वो यूरेनियम संवर्धन की अपनी दौड़ को रोक देगा। ट्रंप का मानना है कि एक बार न्यूक्लियर खतरा खत्म हो जाए, तो बाकी क्षेत्रीय मुद्दों को मैनेज किया जा सकता है।
इजरायल और अरब देशों का क्या होगा
अगर ट्रंप ईरान से हाथ मिलाते हैं, तो सबसे पहले फोन इजरायल से आएगा। बेंजामिन नेतन्याहू कभी भी ईरान के साथ किसी भी तरह के समझौते के पक्ष में नहीं रहे। उनके लिए ईरान का वजूद ही एक खतरा है। लेकिन ट्रंप का रिश्ता इजरायल के साथ काफी मजबूत रहा है। उन्होंने ही दूतावास को यरूशलेम शिफ्ट किया था। वो अब नेतन्याहू को ये समझाने की कोशिश करेंगे कि ये डील इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बेहतर है।
दूसरी तरफ सऊदी अरब जैसे देश हैं। वो भी ईरान के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए हैं। लेकिन हाल के सालों में रियाद और तेहरान के बीच चीन की मध्यस्थता से कुछ बर्फ पिघली है। ट्रंप इस स्थिति का इस्तेमाल करके एक बड़ा 'ग्रैंड बारगेन' करना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि पूरा मिडिल ईस्ट एक नए आर्थिक ढांचे में फिट हो जाए जहां लड़ाई-झगड़े की जगह व्यापार ले ले।
ईरान के सामने असली चुनौती
ईरान के लिए ट्रंप पर भरोसा करना आसान नहीं होगा। उन्होंने ही जनरल कासिम सुलेमानी को मारने का आदेश दिया था। ईरान के कट्टरपंथी गुट अभी भी उस जख्म को भूले नहीं हैं। लेकिन हकीकत ये है कि ईरान को पैसों की जरूरत है। उसे अपने तेल के लिए बाजार चाहिए। उसे अपनी करेंसी को गिरने से बचाना है।
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के पास दो रास्ते हैं। या तो वो अपनी पुरानी जिद पर अड़े रहें और देश को और ज्यादा गरीबी में धकेल दें। या फिर ट्रंप के साथ एक नई मेज पर बैठें। ट्रंप की शर्त बहुत बुनियादी है। वो नहीं चाहते कि ईरान अपनी मिसाइलें खत्म कर दे या हिजबुल्लाह को सपोर्ट करना तुरंत बंद कर दे। वो सिर्फ ये कह रहे हैं कि 'बम मत बनाओ'। ये एक ऐसी मांग है जिसे ईरान बातचीत के लिए एक शुरुआती बिंदु मान सकता है।
क्यों ये डील पिछली वाली से अलग होगी
पुरानी न्यूक्लियर डील में बहुत सारी तकनीकी बातें थीं। उसमें 'सनसेट क्लॉज' जैसे मुद्दे थे जिनसे इजरायल को चिढ़ थी। ट्रंप की प्रस्तावित डील शायद बहुत सरल होगी। वो शायद कागजों से ज्यादा जुबान की कीमत पर यकीन करेंगे। उनका स्टाइल है कि पहले दबाव बनाओ और फिर राहत देकर अपनी बात मनवा लो।
ईरान को भी पता है कि जो बाइडन के मुकाबले ट्रंप के साथ डील करना ज्यादा प्रेडिक्टेबल हो सकता है। बाइडन के साथ मानवाधिकार और लोकतंत्र जैसे मुद्दे बीच में आ जाते हैं। ट्रंप को इन चीजों से ज्यादा मतलब नहीं है। उन्हें मतलब है सिर्फ सुरक्षा और अमेरिका के फायदे से। अगर ईरान ये गारंटी दे देता है, तो ट्रंप शायद उन पर लगे आधे से ज्यादा प्रतिबंध एक झटके में हटा दें।
क्या वाकई शांति आएगी
ये कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप का ये दांव काम कर जाएगा। मिडिल ईस्ट में आग बुझाना इतना आसान नहीं है। हमास और इजरायल की जंग ने माहौल को और खराब कर दिया है। लेकिन ट्रंप को लगता है कि वो 'अब्राहम अकॉर्ड' का दूसरा हिस्सा पूरा कर सकते हैं। वो एक ऐसे मिडिल ईस्ट का सपना देख रहे हैं जहाँ अमेरिका को अपनी सेना न रखनी पड़े और सारा काम डील्स के जरिए हो जाए।
ईरान इस वक्त रूस और चीन के भी करीब जा रहा है। ट्रंप की कोशिश होगी कि ईरान को उस खेमे से खींचकर वापस ग्लोबल इकोनॉमी का हिस्सा बनाया जाए। अगर वो इसमें कामयाब होते हैं, तो ये उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी जीत होगी। लेकिन इसके लिए उन्हें ईरान के भीतर बैठे उन लोगों को भी मनाना होगा जो अमेरिका को 'बड़ा शैतान' मानते हैं।
अब आगे क्या
अब गेंद ईरान के पाले में है। ट्रंप ने अपना रुख साफ कर दिया है। वो बातचीत के भूखे हैं। वो चाहते हैं कि दुनिया उन्हें एक 'पीसमेकर' के रूप में देखे। लेकिन ईरान के पास सोचने के लिए ज्यादा वक्त नहीं है। अगर वो इस मौके को गंवा देते हैं, तो ट्रंप का दूसरा चेहरा यानी 'मैक्सिमम प्रेशर 2.0' देखने को मिल सकता है। जो पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक होगा।
ईरान को अपनी सुरक्षा और अपनी अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाना होगा। क्या वो एक परमाणु बम की ख्वाहिश के लिए पूरे देश को दांव पर लगाएंगे? या फिर ट्रंप की उस एक शर्त को मानकर अपनी तकदीर बदलेंगे? मिडिल ईस्ट की राजनीति अब इसी एक सवाल के इर्द-गिर्द घूमेगी।
ईरान को तुरंत अपनी कूटनीतिक टीम को सक्रिय करना चाहिए। उन्हें ट्रंप के करीबियों से संपर्क साधकर ये समझना होगा कि इस 'एक शर्त' की बारीकियां क्या हैं। अगर तेहरान ने थोड़ी सी भी लचीलापन दिखाया, तो आने वाले कुछ महीनों में हम एक ऐतिहासिक समझौते के गवाह बन सकते हैं। ये सिर्फ ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के तेल बाजार और सुरक्षा के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट होगा।